"Slum Dog Millionaire"....... a masterpiece, truly a classic. Generally I'm not impressed with the kind of movies being made these days but Slum Dog completely bowled me over. I get involved more and more with each and every scene, each and every actor who showed his/her craft brilliantly. Be it the small boy who played younger Jamal who showed his love ad enthusiasm to meet Mr. Bachchan that he didn't even cared about jumping into shit, or his happiness when he was taken by his brother to Maman since he was in the impression that he is gonna be rich and famous. I loved his line "apne din badalne waale hai bhai", truly awsome. Then comes the Anil Kapoor, he looked so authentic as a jealous and hardcore money minded businessmen that you really begin hating him at some point or the other while watching the movie. Even the director and the script writer deserves equal credential for their meticulous efforts which they put i each and every scene is truly remarkable. The music which takes the narative forward is outstanding. A. R. Rehman is surely a genius who dares to experiment and qualify each and every test with flying colours. I wouldn't be shocked if TZP loses the oscar to SlumDog Millionaire. Truly Hats off to the cast and the crew.
Monday, January 12, 2009
Saturday, September 27, 2008
Wake Up Before Its Too Late!
This thought came to me while I was going through some article in a daily newspaper, which was about the popularity of English as the first preferred language among the youth of our country. Many of us don't even know meaning of some of the "out of fashion" or "out-dated" hindi words. Though this may be quite natural, for us to be much more inclined towards the language which is spoken by majority of the people across the world but is it natural to ignore our own tradition, our own culture, just in order to copy others. Or to be more specific to be called as global citizens. Many of you reading this, may find this a little exaggerated but just think upon, how many of you remember exactly the exact wordings of our national song or national anthem or even how many of you can correctly differentiate between the two. Hardly the number would cross two digits. I am not criticising anyone, as a matter of fact even I don't remember the lyrics of the song exactly. Its not just one example, there are enough number of evidence to prove the fact that we Indians are neglecting our Mother tongue. Even to say we have converted it from Mother tongue to just Other tongue. Even now, its not too late to start preserving our language, our culture and tradition, or else some years down the line, Hindi would become a language like Sanskrit, and would only be learned and practiced by a minority of the society. Wake Up before its too late!!
Friday, April 11, 2008
आजादी
जब भारत मान के अपने बेटे,
सीना छलनी करते है,
भाई भाई का बड़े चो से,
लहू पी लिया करते है,
अंग्रेजो से आजादी ली हमने,
सीना तान के,
फिर क्यों बैरी बने हुए है,
ख़ुद अपनी ही जान के,
छोटी छोटी बातों पर क्यों,
चाकू छुरियां चलती है,
क्यों लोगो के बीह में अब,
शक की कलियाँ खिलती है,
आदर्शो के सूखे नारे,
हर रोज़ लगाए जाते है,
बेईमानी के पानी से क्यों,
गले भिगाये जाते है,
क्यों सिसक सिसक के कोई बेटी,
जीवन अपना जीती है,
समाज के कच्चे तारो से क्यों,
लबो को अपने सीटी है,
कितने ही रावण कलयुग में,
लंका अपनी बसाते है,
और कितनी ही सीटों को हम,
बेदी पर चढाते है,
एक रोटी के टुकड़े पर क्यों,
कुत्ते से लोग लपकते है,
मानव का व्यवहार छोड़ क्यों,
पशुओ सी आँख झपकते है,
हर नुक्कड़ पर एक नया मवाली,
पल पल में पैदा होता है,
चांदी के चाँद टुकडों में,
लोगो का सौदा होता है,
ये आजादी है तो क्या हमने,
आजादी को पहचाना है,
औरो की बात करू मैं क्या,
क्या स्वयं को हमने जाना है,
क्या स्वयं को हमने जाना है ||
सीना छलनी करते है,
भाई भाई का बड़े चो से,
लहू पी लिया करते है,
अंग्रेजो से आजादी ली हमने,
सीना तान के,
फिर क्यों बैरी बने हुए है,
ख़ुद अपनी ही जान के,
छोटी छोटी बातों पर क्यों,
चाकू छुरियां चलती है,
क्यों लोगो के बीह में अब,
शक की कलियाँ खिलती है,
आदर्शो के सूखे नारे,
हर रोज़ लगाए जाते है,
बेईमानी के पानी से क्यों,
गले भिगाये जाते है,
क्यों सिसक सिसक के कोई बेटी,
जीवन अपना जीती है,
समाज के कच्चे तारो से क्यों,
लबो को अपने सीटी है,
कितने ही रावण कलयुग में,
लंका अपनी बसाते है,
और कितनी ही सीटों को हम,
बेदी पर चढाते है,
एक रोटी के टुकड़े पर क्यों,
कुत्ते से लोग लपकते है,
मानव का व्यवहार छोड़ क्यों,
पशुओ सी आँख झपकते है,
हर नुक्कड़ पर एक नया मवाली,
पल पल में पैदा होता है,
चांदी के चाँद टुकडों में,
लोगो का सौदा होता है,
ये आजादी है तो क्या हमने,
आजादी को पहचाना है,
औरो की बात करू मैं क्या,
क्या स्वयं को हमने जाना है,
क्या स्वयं को हमने जाना है ||
प्रतिरोध
हूँ श्रेष्ठ मैं, उत्कृष्ठ मैं,
मन मूढ़ है ये सोचता,
संसार को परितक्त्य करके,
ख़ुद में रसो को ढूँढता,
अपनी त्रुटी पर हास्य करके,
मैं जीतता हूँ स्वयं से लड़के,
प्रकाश मिश्रित कालिमा में,
परिचय अपना खोजता,
अतीत की परछियो में,
जब ह्रदय ये झाकता है,
दूर दिखता हूँ शिखर पर,
सफलता के उच्चतम डगर पर,
गद्गादाती तालियों की,
हर तरफ़ झंकार है,
नाम ही हर पल है मेरा,
मेरी जय जयकार है,
वाणी में इतनी पबलता,
भेदती आकाश को,
चेहरे पर जो तेज चमके,
ढक ले सूर्य प्रकाश को,
जो चेतना पहले थी मेरी,
अब टू जड़ सी हो गयी है,
उन्माद की अमूल्य हांडी,
मुझसे कही टू खो गयी है,
मेरा ही अतीत अब क्यों,
पीछे मुझको खीचता है,
कोई नयी रचना करूं मैं,
हक़ क्यों मुझसे छीनता है,
अपने इस प्रतिरोध का तुम,
बोलो मैं प्रतिशोध क्या लू,
जब रिपु मुझमे ही है तो,
कैसे उसका क्षय करू,
पर आज प्रण करता हूँ मैं ये,
प्रतिरोध अब आने न दूँगा,
पंख मिले या न मिले,
पर मैं गगन में फिर उडूंगा,
पर मैं गगन में फिर उडूंगा ||
मन मूढ़ है ये सोचता,
संसार को परितक्त्य करके,
ख़ुद में रसो को ढूँढता,
अपनी त्रुटी पर हास्य करके,
मैं जीतता हूँ स्वयं से लड़के,
प्रकाश मिश्रित कालिमा में,
परिचय अपना खोजता,
अतीत की परछियो में,
जब ह्रदय ये झाकता है,
दूर दिखता हूँ शिखर पर,
सफलता के उच्चतम डगर पर,
गद्गादाती तालियों की,
हर तरफ़ झंकार है,
नाम ही हर पल है मेरा,
मेरी जय जयकार है,
वाणी में इतनी पबलता,
भेदती आकाश को,
चेहरे पर जो तेज चमके,
ढक ले सूर्य प्रकाश को,
जो चेतना पहले थी मेरी,
अब टू जड़ सी हो गयी है,
उन्माद की अमूल्य हांडी,
मुझसे कही टू खो गयी है,
मेरा ही अतीत अब क्यों,
पीछे मुझको खीचता है,
कोई नयी रचना करूं मैं,
हक़ क्यों मुझसे छीनता है,
अपने इस प्रतिरोध का तुम,
बोलो मैं प्रतिशोध क्या लू,
जब रिपु मुझमे ही है तो,
कैसे उसका क्षय करू,
पर आज प्रण करता हूँ मैं ये,
प्रतिरोध अब आने न दूँगा,
पंख मिले या न मिले,
पर मैं गगन में फिर उडूंगा,
पर मैं गगन में फिर उडूंगा ||
Thursday, April 10, 2008
ऐश तेरा सौंदर्य

ऐश तेरा सौंदर्य,
हमे एहसास दिलाता है;
की इश्वर पृथ्वी पर कुछ ही सही,
परियां भी बनता है;
तुझे उसने मिटटी से नही,
केसर से बनाया होगा;
फिर आंखों में पत्थर की जगह,
तारों को लगाया होगा;
तेरे आगे हर आकर्षण,
तुच्छ हो जाता है;
ऐश तेरा सौंदर्य,
हमे एहसास दिलाता है;
जुल्फों को तेरी घटाओं के,
दस्ते से सजाया होगा;
लबों को तेरे सूरज की,
लाली से भिगाया होगा;
सुबह को, तेरे चेहरे की,
सुनहरी मुस्कान, और संध्या को,

तेरे नैनो का दमकता काजल भी बनाया होगा;
तेरे बखान में हर शब्द,
फीका पड़ जाता है;
ऐश तेरा सौंदर्य,
हमे एहसास दिलाता है;
ऐश तेरा सौंदर्य,
हमे एहसास दिलाता है;
प्रेम
चल खो जाए अब तारों की,
चादर के हम तुम नीचे;
न फिक्र रहे, भय लगे न कोई,
बस अँखियाँ मीचे मीचे;
बस अँखियाँ मीचे मीचे,
हम तुम प्रेम के रिश्ते बोये;
गर सख्त लगे कभी ह्रदय भूमि तो,
अपने सुख दुःख सीचे;
मोती ये यादों के जो,
नैनन से झर जाए;
न रोक लगे इन पर कोई,
न कहने पर आए;
तू प्रेम के धागे से अपने,
बाँध ले इनको साथी;
हर धन से ऊंची पूँजी है,
कीमत नही जरा सी;
चादर के हम तुम नीचे;
न फिक्र रहे, भय लगे न कोई,
बस अँखियाँ मीचे मीचे;
बस अँखियाँ मीचे मीचे,
हम तुम प्रेम के रिश्ते बोये;
गर सख्त लगे कभी ह्रदय भूमि तो,
अपने सुख दुःख सीचे;
मोती ये यादों के जो,
नैनन से झर जाए;
न रोक लगे इन पर कोई,
न कहने पर आए;
तू प्रेम के धागे से अपने,
बाँध ले इनको साथी;
हर धन से ऊंची पूँजी है,
कीमत नही जरा सी;
उड़ान
कितने सारे अरमानों को,
पुरा मुझको करना है,
पंख मिले या न मिले अब,
बस मुझको तो उड़ना है.
उड़ना है उन्मुक्त गगन में,
पहुचना है तारो से दूर,
चमकना है जहाँ में ऐसे,
जैसे चमके लाल सिन्दूर,
न दिन का न ही रातो का,
फर्क अब मुझे करना है,
पंख मिले या न मिले अब,
बस मुझको तो उड़ना है.
कितने ही शिखरों को जाने,
और परास्त करना होगा,
इस भयानक अंधकार से,
जाने कब सूर्योदय होगा,
परिश्रम के इस दीपक को,
सदा यूं ही प्रज्वाल्लित रखना है,
पंख मिले या न मिले अब,
बस मुझको तो उड़ना है.
दिल करता है की बस अब उड़कर,
दूर कहीं छुप जाऊं मैं,
इसका मतलब की दुनिया में लेकिन,
कभी न वापस आऊं मैं,
पर अपने हर डर से मुझको,
बस मुझको ही लड़ना है,
पंख मिले या न मिले अब,
बस मुझको तो उड़ना है.
Subscribe to:
Posts (Atom)